Sunday, August 23, 2015

अक्षर घाट - 47


जिनको हम अक्सर सुनते हैं उनकी आवाज़ की तरंगें दिमाग में दर्ज़ हो जाती हैं । कहीं रेडियो पर गीत बज रहा हो तो हम आँख बंद किए हुए ही बता देते हैं कि यह किशोर कुमार का गला है या मुहम्मद रफ़ी का है या फिर मुकेश ,तलत महमूद का है । लता मंगेशकर की आवाज़ में एक गीत बजता है - मेरी आवाज़ ही पहचान है । कवि की अपनी आवाज़ जहाँ सुनाई पड़ती है वह इलाका उसकी कविता का होता है । 
संगीत में श्रोता जिस तरह गायक की आवाज़ की शिनाख्त करता है उसी तरह कविता का पाठक कवि की आवाज़ की शिनाख्त उसकी कविता में करता है । लेकिन श्रोता और पाठक दोनों के लिए हालात तब बड़े मुश्किल भरे हो उठते हैं जब आवाज़ की शिनाख्त ही न की जा सके । वह भ्रमित होता है । और उसे भ्रमित करने वाला भी कोई कलाकार ही होता है । भ्रमित करने की यह कला है मिमिक्री । आप जानते हैं कि बढ़िया मिमिक्री आर्टिस्ट आपको किशोर कुमार की आवाज़ में गाना सुना सकता है और आप को लगेगा कि अरे यह तो वही आवाज़ है । कविता की दुनिया में मिमिक्री करने वाले कवि भी कामयाब हो जाते हैं ठीक इसी तरह ।
लेकिन यह एक तथ्य है कि दिलों पर राज वही करते हैं जो अपनी मौलिकता के साथ गीत गाते या कविता लिखते हैं । अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद कुमार शानू और बाबुल सुप्रियो किशोर कुमार की मिमिक्री करने वाले गायक हैं । शब्बीर कुमार और मुहम्मद अजीज एक जमाने में मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ की मिमिक्री करते थे । कविता के भी अपने कुमार शानू और शब्बीर कुमार हर दौर में रहे हैं ।
जब तब लोग पूरी समकालीन कविता को ही केदार स्कूल की कविता कह कर निकल जाते हैं । केदार स्कूल से मतलब केदारनाथ सिंह की कविता के घराने से हैं ।
यहाँ एक बात पर ध्यान देना जरुरी है । अपनी गायकी के शुरुवाती दौर में किशोर कुमार और मुकेश तक कुंदन लाल सहगल की मिमिक्री किया करते थे । लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी निजी और मौलिक आवाज़ पा ली या उसे अर्जित कर लिया । बहुत कम कलाकार अपने लिए यह कर पाते हैं । कविता में भी पूर्ववर्ती कवियों के प्रभाव से मुक्त हो जाने वाले कवि हर दौर में कम हुए हैं । वे बहुत जल्द अपनी आवाज़ को अर्जित कर लेते हैं ।
कविता में किसी कवि के लिए अपनी परंपरा से अलग होना मुमकिन नहीं होता । वह काव्य परंपरा में कुछ नया जोड़कर अपना हक़ अदा करता है । मेरा
स्पष्ट मानना है कि केदारनाथ सिंह की कविता का कोई वैसा घराना है ही नहीं । वे अपनी ओर से कविता को अधिक सहज और सम्प्रेषणीय जरुर बनाते हैं । उसे आमफहम जुबान में संभव करते हैं । केदारनाथ सिंह का काव्य संसार अपनी विलक्षणता के लिए नहीं पहचाना जाता जैसा कि मुक्तिबोध की कविता पहचानी जाती है । ऐसे में यह विचार का विषय होना चाहिए कि मुक्तिबोध जैसी कविता क्यों फिर संभव नहीं हो सकी जबकि केदारनाथ सिंह जैसी कविता बहुत से लोग लिखते हैं । आधुनिक हिन्दी कविता निराला से अज्ञेय और रघुवीर सहाय ,सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि तक बहुत हद तक आम बोलचाल की भाषा में ढल चुकी होती है । केदारनाथ सिंह उसमें अपना कहन जोड़ते हैं । वे निस्संदेह महत्वपूर्ण कवि हैं किन्तु मुक्तिबोध की तरह के युगांतकारी कवि वे नहीं हैं ।
कविता में अपनी आवाज़ पाने की जद्दोजहद सबसे अधिक कहीं दिखती है तो वह विनोद कुमार शुक्ल की कविता का संसार है । यहाँ एक छोटा सा किस्सा याद आ रहा है । एक दुकानदार ने अपनी दुकान के सामने बड़ा ही सुन्दर बोर्ड लगाया था जिसमें बताया गया था कि वहाँ फलाँ फलाँ चीजें मिलती हैं । लेकिन बहुत वक़्त बीता वहाँ कोई ग्राहक नहीं आया । लोग देख कर गुज़र जाते । एकदिन दुकानदार ने उस ख़ूबसूरत बोर्ड को उलट दिया । आश्चर्य कि अब इस उलटे बोर्ड को देखने के लिए लोग आते जाते रुक कर देखने लगे । उनकी उत्सुकता उस लिखे में बढ़ने लगी थी अब जबकि वह उलटा लटका हुआ था । यही बोर्ड उलटने का काम विनोद कुमार शुक्ल हिन्दी कविता में करते हैं । और लोग उनकी तरफ गौर से देखते भी हैं । उनमें उपलब्ध शिल्प को तोड़ने की जिद जबरदस्त है । यहाँ तक कि वे सायास सीधी बात भी उलटे तरीके से कहते हैं । यहाँ उदाहरण देने का अवकाश नहीं है । उनकी कविताएँ इस बात की गवाही देती हैं । इसके मनोवैज्ञानिक कारण है जिनकी व्याख्या जरुरत पड़ने पर अलग से की जा सकती है ।
आप यह भी देखें कि अलग होना और अलग दिखना दो अलग बातें हैं | अलग दिखना किशोर उम्र का मनोवैज्ञानिक आधार है | मिमिक्री करना शैशव का मनोवैज्ञानिक आधार है | सचमुच अलग होना युवा का मनोवैज्ञानिक आधार होता है | कहने का अर्थ यह कि किसी कवि में लेखन के शुरुवाती दौर में बहुत संभव है कि उसकी आवाज़ किसी ऐसे कवि से मिलती है जिसकी अपनी पहचान तब तक स्थापित और स्वीकृत हो चुकी है | उम्र ज़रा बढ़ने पर अलग दिखने की स्वाभाविक चाह उसमें नयेपन का आग्रह पैदा करती है | लेकिन युवा होते होते उसे अपनी पहचान बनानी होती है | यह विकास का स्वाभाविक नियम है | लेकिन हम जानते हैं और समाज का इतिहास बताता है कि बहुधा युवा होने तक व्यक्ति की मानसिक उम्र कम भी हुआ करती है | किसी क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट के पास जाइए तो वह आपकी मेंटल एज बता देगा | वह आपकी फिज़िकल एज से अलग भी हो सकती है | कविता में यह अक्सर होता है कि एक कवि की भौतिक उम्र के आधार पर हम उसे वरिष्ठ कवि कहते हैं या ऐसा कहने की परंपरा है | कवि की आवाज़ का उसकी भौतिक उम्र से नहीं बल्कि उसकी मानसिक उम्र से वास्ता होता है | कविता में युवा होना दरअसल अपनी आवाज़ को अर्जित कर लेना है | एक कवि के विकास का ग्राफ़ इस बात के संकेत देता है कि कवि किस उम्र में है और उसने अपनी आवाज़ पा ली है या किसी हिट गाने के कोरस गान में शामिल है |
  

अक्षर घाट -46


अक्सर पूछा जाता है कि समकालीन हिन्दी कविता में कात्यायनी और नीलेश रघुवंशी के बाद कौन ? मैं पूछना चाहता हूँ कात्यायनी और नीलेश रघुवंशी को कविता में स्त्री का प्रतिनिधि नियुक्त करने वाला कौन है ? हिन्दी कविता में बहुत से स्वर ऐसे हैं जिनकी थाह आपको नहीं होगी लेकिन फिर भी जो कविता में स्त्री के प्रामाणिक स्वर हैं | स्त्री कविता महज चूल्हा-चक्की, घर-संसार और राग-अनुराग के निजी अनुभवों तक सीमित नहीं है इस बात को अगर आपको प्रत्यक्ष देखना है तो दिल्ली के आलोचकों की बनाई चौहद्दी से बाहर आकर देखना होगा | अनामिका , सविता सिंह , सुमन केशरी , कात्यायनी , नीलेश रघुवंशी  आदि के अलावा भी बहुत से कवि ऐसे हैं जिन्हें या तो पढ़ा नहीं जाता या फिर पढ़ कर भी उनको नज़र-अंदाज़ कर दिया जाता है | आज हालत वैसे नहीं रहे कि आप एक जरूरी आवाज़ को लम्बे समय तक दबाये रह सकें | इंटरनेट और सोशल मीडिया की बढ़ती स्वीकार्यता ने उन तमाम दबाये गए स्वरों के लिए सारे बंद दरवाज़े खोल दिये हैं | इससे पहले भी बहुत सी लघु पत्रिकाएँ इन जरूरी आवाजों को जगह देती रही हैं | आज इन जरूरी आवाज़ों में निर्मला पुतुल , नीलम सिंह , लीना मल्होत्रा , मृदुला शुक्ला , अपर्णा मनोज , शाहनाज़ इमरानी , रेखा चमोली , जसिंता केरकेट्टा आदि भी शामिल हैं जिनपर बात होनी चाहिए | इनकी आवाज़ें दिल्ली तक भले ही न पहुँचती हों लेकिन इनकी अलग अलग विशिष्टताएँ इन्हें सुने जाने की माँग तो रखती ही हैं | यहाँ सबसे पहले नीलम सिंह की बात करना चाहूँगा जिन्हें बहुत निकट से जानता हूँ और जिन्हें बराबर पढ़ता रहा हूँ |

इस कवि को पढ़ते हुए एक साथ बहुत सी काव्य परम्पराओं की गूँजें सुनाई देती है । यहाँ धूमिल का विद्रोही स्वर है तो कात्यायनी की राजनैतिक सजगता है । त्रिलोचन की जनपदीय चेतना है तो दुष्यंत कुमार की विदग्धता भी है । काव्य विषयों के मामले में यहाँ नागार्जुन जैसा खुलापन है तो भवानीप्रसाद मिश्र की गेयता भी है । आलोचक परमानन्द श्रीवास्तव ने इस कवि के पहले संग्रह के बारे मे लिखा कि इसमें कविता के अन्तर्वस्तु का वैविध्य चकित करता है , तो यह अकारण नहीं था । लोक पर कवि की पकड़ मज़बूत है और स्वाभाविक रूप से घर , मां , पिता , बेटी जैसे काव्य विषय प्रचुरता में यहाँ आ सके हैं । नीलम सिंह का पहला ही काव्य-संग्रह याद दिलाता है कि हिन्दी कविता में स्त्री का मूल स्वर वह नहीं है जो इन दिनों कविता में एक मुहावरा बन चुका है । यहाँ व्यक्ति के दुख दर्द समष्टि के दुख दर्द बन कर प्रकट होते हैं । मौज़ूदा स्त्री-कविता में कोहरे की तरह छाये भावोछ्वास को भेदती हुये कविताएँ जीवन जगत के कार्य व्यापार को अपनी गहरी ईमानदारी और सघनता के साथ दर्ज़ करती हैं । इस अर्थ में पाठक को यह यकीन दिलाने की ज़रूरत बाकी नहीं रह जाती है कि ये कविताएँ बनाई गई कविताएँ नहीं हैं, बल्कि जीवन में गहरे धँस कर लिखी गई हैं ।

आकाश की हद तक, संग्रह से "कसक" कविता की ये पंक्तियाँ अपनी अद्भुत लयकारी और गेयता के लिए पाठक के दिल में अपनी जगह बनाने में कामयाब हैं - कि पूछें रास्ता किससे / हमें पहुँचाये जो घर तक / यहाँ हर मोड़ पर तो / सिर्फ़ मुर्दों की ही बस्ती है / समन्दर से अँधेरों के / लड़ें तो हम लड़ें कैसे / हमारे पास तो बस / डूबते सूरज की कश्ती है / सितारे चाँद तो वे / बाँध कर आँचल में चलते हैं / फ़रिश्तों की गली में / ज़िन्दगी ही सिर्फ़ सस्ती है । इसी संग्रह से एक भिन्न स्वर की कविता "माँ जैसी रात" का यह अंश देखें जहाँ कवि रात को उसके समस्त नकारात्मक अर्थ-भार से मुक्त करता दिखाई देता है और रात के काले अँधेरे के बीच से ममता की कोमल किरणें झाँकने लगती हैं - नहीं होती अगर / माँ जैसी रात / हम भटकते ही रहते / ख्वाहिशों के कँटीले जंगल में / कौन रखता / ज़िन्दगी की तपिश से / झुलसते माथे पर / अपना हिमालय जैसा हाथ । एक अन्य कविता "ये कैसा जनतन्त्र है" की पंक्तियाँ कवि की राजनैतिक समझ के बारे में आश्वस्त करती हैं जहाँ आत्म-निरीक्षण के लिए कविता में पर्याप्त स्पेस है - ये कैसी जनता है / जो शोर भरे जंगल में / नींद खरीदने जाती है / ये कैसी आँखें हैं / कि आइने के बीच / खड़े होने वाले भी / अपना चेहरा नहीं देख पाते हैं / ये कैसी प्यास है / कि हम गंगा को / समुद्र बना आते हैं । वहीं अपने लोक और जमीन से कवि का जुड़ाव और उसके स्थानीयता बोध की पहचान कराती जनपदीयता बोध से लबरेज़ कविता "कोई तो बोलो" का की ये पंक्तियाँ पाठक को अपनी जडें टटोलने को मजबूर करती दिखाई देती हैं - जाँता ढेकी ओखल मूसर / नीम करौंदा जामुन गूलर / चिलबिल झरबेरी की बातें / ताड़ों की वो अनगिन पाँतें / कहाँ गईं कोई तो बोलो / सूनी हुई बावली कैसे / टूटा मन्दिर और शिवाला / पोखर के सब घाट खो गये / गाँवों की सब हाट बाट भी / हाँ गई कोई तो बोलो ।

ऐसी ही विविधवर्णी कविताओं का समुच्चय , आकाश की हद तक की कविताएँ अपनी सच्चाई के दम पर पाठकों को न सिर्फ़ आश्वस्त करती हैं बल्कि स्त्री कविता की विश्वसनीयत को एक बार फ़िर से प्रतिष्ठित कर पाने में सफल हैं |  ऐसे कवि के यहाँ पाठक अपनत्व की गरमाहट पाता है | आलोचना की सिद्धांतिकी पर इन कविताओं को जाँचने से पहले इनके भीतर से आती पुकार को सुनना होगा | ये वो आवाज़ें हैं जिन्हें एक मुद्दत से सुना नहीं गया है कविता में | यहाँ हो सकता है अभ्यास की कमी नज़र आये , हो सकता है कविता के चौकठ-बाजू जरा ढीले-ढाले हों , हो सकता है कि कसा हुआ सम्पादन न दिखाई दे और हो यह भी सकता है कि यदा कदा भावुकता कविता का बड़ा हिस्सा घेरती हुई दिखाई दे , तथापि कविता में ऐसे स्त्री स्वर को सहृदय होकर सुने जाने की जरूरत है | ये वो आवाज़ें हैं जिनके लिए दुष्यंत कुमार कहते हैं - मैं भी तो अपनी बात लिखूँ अपने हाथ से , मेरे सफे पे छोड़ दे थोड़ा सा हाशिया |




अक्षर घाट -45


‘निकल गली से तब हत्यारा / आया उसने नाम पुकारा / हाथ तौल कर चाकू मारा / छूटा लोहू का फ़व्वारा / कहा नहीं था उसने आख़िर उसकी हत्या होगी’ - कविता से बाहर निकल कर रामदास पिछले दिनों हमारे सामने आ खड़ा हुआ था | प्रतिरोध की आवाज़ों को जिस निसृंश तरीके से और जिस निर्ममता के साथ दबाने के लगातार दृष्टांत इधर सामने आये उनको देखते हुए रघुवीर सहाय की कविता का रामदास मानो फिर पुनर्जीवित होकर सामने खड़ा था | रामदास हमसे सवाल कर रहा था - क्या इस हत्या का कोइ प्रतिकार संभव है ? क्या मोमबत्ती जुलूस और धरना प्रदर्शन से आगे भी नागरिक जमात का गुस्सा किसी मुकाम तक पहुँचेगा ?
मुझे बार बार इस बात का अहसास होता है कि सभ्य समाज के अभ्यंतर में गुस्से से अधिक भय है | सिविल सोसाइटी डरी हुई है | वह सीधे किसी टकराव की स्थिति में नहीं पाती खुद को | और इसीलिए गुस्से का अभिनय करती है | विरोध और प्रदर्शन के आयोजन इसी भय का प्रकटीकरण हैं | यह गुस्सा स्वतःस्फूर्त गुस्सा नहीं है | होता तो यह अपने प्रतिकार को भी पा लेता | किसी घटना विशेष का उल्लेख न भी करें तो एक बात जो सामान्य तौर पर ऐसे नागरिक गुस्से को लेकर लक्षित की जा सकती है वह यह कि बहुत जल्द ही यह गुस्सा ठण्डा पड़ जाया करता है और अगली किसी दुर्घटना तक के लिए नागरिक जमात अपने रूटीन जॉब में लग जाती है | अपवाद छोड़कर ऐसे मौके फोटो शूट में बदल जाया करते हैं |
क्या आपको नहीं लगता कि बाहर किसी आर पार की लड़ाई से पहले हमें अपने घर को ठीक करने की जरूरत है | शत्रु जब घर के भीतर होता है तब उससे लड़ना कठिन होता है | बात स्त्री अधिकारों की हो अथवा सामान्य नागरिक अधिकारों की उसको संबोधित करने की प्राथमिक जगह हमारे घर ही होते हैं | हत्यारे आसमान से नहीं उतरते | उनका ब्रीडिंग ग्राउण्ड ये घर और ये समाज ही होते हैं प्रथमतः | ज़रा सोचिये ऐसे किसी प्रतिरोधमूलक अनुष्ठान का क्या अर्थ रह जाता है जब तक यह सुनिश्चित न कर लिया जाए कि हर स्त्री अपने घर में समस्त नागरिक अधिकार पा सके | बाहर किसी हत्यारे से हम तब तक डरते रहेंगे जब तक कि अपने घरों को ऐसे किसी अपराधी से पूरी तरह निर्मूल नहीं कर लेते |
यह जो तथाकथित विकास करता हुआ समाज है उसकी बुनियाद में ही गड़बड़ी है | ऐसे समाज के विकसित होने का क्या अर्थ रह जाता है जिसमें अपने मन की बात कहने की सजा व्यक्ति की हत्या है | साहसी लोग आज की दुनिया में बहुत कम हैं | और जो हैं वे भी मारे जा रहे हैं | वे मारे इसीलिए जा रहे हैं कि वे संख्या में बहुत कम हैं | यकीन मानिए जिस दिन साहसी लोग संख्या में अधिक होंगे उनका मारा जाना स्वतः बंद हो जायेगा | रामदास जब मारा जाता है तब कोई हत्यारे को रोकने के लिए बाहर नहीं आता लेकिन तमाशा देखने के लिए बहुत से लोग बाहर आते हैं | दोस्तो यह तमाशा देखना जब तक चलता रहेगा तब तक रामदास जैसे लोग मारे जाते रहेंगे | भय हत्या को भी तमाशे में बदल देता है |
ढाका में एक पत्रकार लेखक इसलिए मार दिया जाता है कि वह मुक्त मन से मौलवादी ताकतों के खिलाफ ब्लॉग लिखता रहा है | कोई हत्यारों को रोकने की कोशिश नहीं करता | लेकिन हत्या के बाद बहुत से लोग प्रदर्शन करते देखे जाते हैं | कौन हैं ये लोग ? इनके हाथों में जलती हुई मशालें हैं जो संभवतः बैटरी चालित हैं और बाँस की लगभग एक जैसी लाठियों से तैयार की गई हैं | विरोध प्रदर्शन की अगली कतार में कुछ महिलाएँ हैं जिनके पहनावे और केश सज्जा को देख कर कहना मुश्किल हो जाता है कि यह किसी विरोध प्रदर्शन में निकली हैं या फैशन परेड में | कई नौजवान नंगे बदन अपनी देह पर लाल रंग में नारे लिख कर विरोध करते देखे जाते हैं | ये कौन हैं ? ये तब कहाँ होते हैं जब कोई हत्यारा अपना चाकू निकाल रहा होता है | तब कहाँ बिला जाता है वह गुस्सा जो इन तसवीरों में उबाल खाता हुआ दिखता है | यह गुस्सा है भी या गुस्से का अभिनय मात्र है |
दिल्ली की सड़कों पर एक लड़की इसलिए मार दी जाती है कि उसने देर शाम किसी दोस्त के साथ शहर में निकलने की हिमाकत की है | चार अशिक्षित लम्पट गुण्डे बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर देते हैं और कोई शहरी अपनी कार तक नहीं रोकता | लेकिन विरोध प्रदर्शन और मोमबत्ती जुलूसों में पूरी दिल्ली उमड़ पड़ती है | यह कौन सी दिल्ली है ? समाज में और जीवन में बदलाव इसलिए भी नहीं दिखता कि जहाँ जेनुइन गुस्सा होना चाहिए वहाँ गुस्से का अभिनय मात्र है | जहाँ जेनुइन विरोध होना चाहिए वहाँ विरोध का अभिनय मात्र है | बात ढाका या दिल्ली की ही नहीं | यह देश के किसी भी हिस्से की साधारण सी बात है | हम बेहद डरे हुए लोग हैं जो बातें तो बड़ी बड़ी कर लेते हैं पर हत्याओं का सिलसिला रोकने लिए खुद कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते | हम अपने बच्चों को भी यही तालीम देते हैं | एक आत्मकेंद्रित समाज का यह डरा हुआ चेहरा है जो आये दिन हमारे रू-बरू होता है |
एक भयाक्रांत आत्मकेंद्रित समाज के भीतर कोई हत्यारा यदि हीरो बन जाता है तो उसके कारण इसी समाज के भीतर खोजे जाने चाहिएँ | कोई और आकर हमारे लिए सबकुछ बढ़िया और सुन्दर बना देगा यह संभव नहीं है | कोई उद्धारक नहीं आने वाला | वह होता तो रामदास न मारे जाते | वह होता तो मुक्त मन का लेखक न मारा जाता | न मारी जाती कोई लड़की दिल्ली की सड़कों पर | हत्यारे नागरिक मन के इसी भय से ऑक्सीजन पाते हैं | हत्यारों को नागरिक जमात का सामूहिक साहस ही मार सकता है | वह सामूहिक साहस जिसे मुक्तिबोध परम अभिव्यक्ति नाम देते हैं | रामदास पराजित तभी होते हैं जब वे अकेले होते हैं |



अक्षर घाट - 44

जैसे काशी में गंगातट के घाट , वैसे दिल्ली के प्रगति मैदान में ऑथर्स कॉर्नर | यहाँ आत्माएँ अपना वसन त्याग कर मोक्ष को प्राप्त होती हैं तो वहाँ पुस्तकें उन्मोचित होकर मोक्ष को प्राप्त होती हैं | एक तरफ मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर कापालिकों  की तटस्थ लीला है तो दूसरी ओर साहित्य के कापालिकों की विमोचन लीला है | अभी अभी संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेला से मैं साहित्य की एक नई दुनिया देख कर लौटा हूँ जिसके बारे में कुछ बातें यहाँ रखने की अनुमति चाहता हूँ | सचमुच कुछ दिनों के लिए दिल्ली का यह मैदान साहित्यिकों की लीलाभूमि बना रहा |
दिल्ली पहुँचने से पहले ही सोशल मीडिया पर विश्व पुस्तक मेले की तसवीरें देख कर मन वैसे ही आधा हो गया था | हमारे अधिकांश लेखकों को कायदे से मंच पर बैठना भी नहीं आता | कोई कुर्सी पर ऐसे बैठा है कि एक पल के लिए कोई बादशाहत मिल गई हो - पैर पर पैर चढ़ाए हुए और वह भी कुछ इस तरह से कि अगर आप फोटो देख रहे हैं तो जूते आप के मुँह तक आ जाएँ | बहरहाल कविता में जामुन के पेड़ पर झूला डालने वाले एक कवि का ऐलान हो चुका था कि अगले दिन उनकी पुस्तक को समय के सबसे बड़े कवि के हाथों मोक्ष प्राप्त होने वाला है | यह मामला कुछ ऐसा था कि जैसे अगले दिन मेले में हम जुरासिक युग का कोई प्राणी देखने वाले हों |
ऑथर्स कॉर्नर का मंच सामूहिक विवाह के मण्डप जैसा था जहाँ चट मंगनी पट व्याह की तर्ज पर पुस्तकें लोकार्पित हो रही थीं | चार पाँच लोग मंच पर होते और पंद्रह बीस नीचे कुर्सियों पर | एक जोड़ा उतरता तो दूसरा चढ़ जाता | ध्यान देने की बात यह कि उधर से गुजर रहे लोगों के लिए यह सब ऐसा था जैसे कुछ हो ही नहीं रहा हो | लोग इन सब से बेपरवाह स्टालों पर टहल रहे थे | जिस भीड़ का अनुमान था वह नहीं दिखी हालांकि यह मेरा पहला ही तजुर्बा था इस शहर में जिसके बारे में बताया जाता है कि यह देश में हिन्दी साहित्य का केंद्र है |
किसी पुस्तक मेले में सेल्सगर्ल को काम करते देखना एक नया तजुर्बा था | टीवी ऐंकर से कथाकार बने एक लेखक की किताब के लिए माहौल बनाने के लिए एक बड़े प्रकाशक ने इनको तैनात कर रखा था | ये लड़कियाँ अठारह से बीस की उम्र की रही होंगी | लोगों को पकड़ पकड़ कर उन्हें किताब और लेखक के बारे में बताते हुए और उन्हें किताब खरीदने के लिए प्रेरित करते हुए | वहीं हिन्दी के एक अन्य बड़े प्रकाशक छपे मूल्य पर स्टिकर चिपका कर ऊँचे मूल्य पर किताबें बेचते पाए गए | एक कथाकार मित्र को इस बात से परेशानी हो रही थी कि एक ही दिन में मैं उनसे बार बार टकरा जा रहा था | एक कवि मित्र इसलिए कष्ट में थे कि नामचीन लेखक उनसे दुआ सलाम किये बिना ही आगे निकल जा रहे थे | इसी मेले में एक दिन फासीवाद और साम्प्रदायिकता के विरोध में एक प्रतिवाद सभा भी हुई जिसमें काफी लोग जुटे | जब यह सभा चल रही थी ऑथर्स कॉर्नर पर माइक्रोफ़ोन तेज था और कौन क्या कह रहा है किसी को साफ़ साफ़ सुनाई नहीं दे रहा था | लेकिन इस शोर शराबे के बीच भी तमाम कवि अपनी कविताओं के साथ वहाँ अपनी बारी के इंतज़ार में बैठे या खड़े रहे |
दिल्ली के एक कवि-आलोचक ने मुझसे पूछा क्या आपकी कोई किताब आई है | मैंने कहा - जी , आई है | बोले कहाँ से आई है | मैंने कहा , मैंने खुद छापी है | वे विस्मित हुए | जैसे किसी अजूबे को देख रहे हों | उधर हर तरफ लोकार्पण और विमोचन जारी थे | कुछ लब्ध प्रतिष्ठ लेखक पसीने पसीने हो रहे थे | एक विमोचन से निकल कर वे दूसरे विमोचन की तरफ बढ़ जाते थे | कुल मिला कर यह मेला एक बड़ा ईवेंट था जिसकी इमेज वैल्यू थी | कहने का मतलब यहाँ ली जा रही तसवीरों का महत्व था | उनको लेखकों के अलबम में जमा होकर भविष्य के लिए सुन्दर याद की तरह सुरक्षित हो जाना था |
इन सब बातों से इतर मेले की खासियत यह रही कि बहुत सारे दोस्तो से मुलाक़ात संभव हो सकी | मेल से ही मेला शब्द बना होगा शायद | तो मेल मिलाप खूब हुआ | अपने कई प्रिय कवियों को एक साथ प्रत्यक्ष देखने सुनने का एक ऐसा अवसर जो अन्यथा दुर्लभ है | लेकिन प्रकाशक मित्रो के लिए यह मेला घाटे का सौदा रहा होगा ऐसा मेरा अनुमान है | प्रगति मैदान के भीतर हफ्ते भर स्टाल लगाने का किराया बहुत ज्यादा था , कई मामलों में लाखों में | उस अनुपात में किताबें शायद न बिकी हों | एक प्रकाशक मित्र का कहना था कि यहाँ सिर्फ एक्सपोज़र के लिए आना होता है अन्यथा बिक्री छोटे कस्बों में ज्यादा हो जाती है |
कलकत्ता पुस्तक मेले की तरह शताधिक लोगों का कतार में खड़े होकर किताबें खरीदने वाला दृश्य दिल्ली में मुझे नहीं दिखा | कम किराये वाला लिटिल मैगजीन का मण्डप भी कहीं नहीं नजर आया जो कलकत्ता पुस्तक मेले में अलग से ध्यान खींचता है | कुछ एक प्रकाशकों को छोड़ दें तो अधिकांश मामलों में किताबों की कीमत उनके लागत मूल्य से कईगुना अधिक पाई गई | दस से पच्चीस प्रतिशत तक का डिस्काउंट भी पाठकों को बहुत आकर्षित नहीं कर पा रहा था | इस कलकतिया लेखक के लिए इतना बहुत था कि मित्रो के सहयोग से स्वप्रकाशित किताब की लगभग दो दर्जन प्रतियाँ चार दिन में बिक गईं |
इस विश्व पुस्तक मेला में सर्वाधिक कविता पुस्तकें प्रकाश में आईं ऐसा अनुमान है | बड़ी संख्या में स्त्री कवियों की पुस्तकें प्रकाश में आई हैं | यूँ तो कुछ लोगों को नए प्रकाशकों के आने से तकलीफ भी थी | एक जमाने के मशहूर प्रकाशकों की मोनोपोली टूटती दिखी | देखा जाए तो देश की राजधानी में मेला से अधिक यह किताबों का एक मॉल था |



अक्षर घाट - 43


एक अच्छी कविता अच्छे संगीत की तरह होती है | और अच्छा संगीत वह होता है जो सीधे हमारी आत्मा से जुड़ कर हमारे भीतर एक नाद की सृष्टि करता है | कहा भी जाता है - पोएट्री इज़ नॉट फ़ॉर अनम्यूज़िकल इयर्स | कविता में जीवन का संगीत होता है | जीवन का संगीत सुन सकने वाले कानों के लिए कविता सबसे सुन्दर उपहार है | जीवन का संगीत कहीं भी बिखरा होता है | वह राज प्रासादों में कैद नहीं होता | वह गरीब की झोपड़ी में भी उतनी ही निस्संगता में बहता रहता है | अभागे होते हैं वे कान जिन तक इस संगीत की धमक नहीं पहुँचती | जीवन का यह संगीत धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले काश्मीर में भी उसी तरह बजता है जिस तरह झाबुआ के निविड़ इलाके में | हिन्दी का एक कवि झाबुआ में जीवन का यह संगीत सुनता है और लिखता है - कितनी घासों से मिला / कितनी माँओं से | घास के भीतर मातृत्व को देख पाने वाली दृष्टि को मैं सलाम करता हूँ | घास बहुत से लोगों के लिए जीवन का आधार है | घासें कई बार पूरे पर्यावरण को अपने नाजुक कन्धों पर थामे हुए खड़ी होती हैं | आप पूछ सकते हैं कि कैसे | घास प्रकारांतर से मानव आहार भी बनती है जहाँ कहीं दूसरे उपयोगी अन्न की पैदावार नहीं है अथवा कम है | मवेशियों के लिए तो वह जीवन का संबल है ही | और मवेशी परोक्ष रूप से मनुष्य के जीवन का संबल हैं | जीवन को संबल और आधार देने वाली घासें माँ की तरह दिखती हैं | यह मनुष्य और प्रकृति की वह सहज अवस्था है जहाँ जीवन का सितार बजता है | आप देखें कि यह बात कवि एक ऐसे समय में कह रहा है जबकि प्रकृति के अधिकाधिक दोहन से पैसे कमाने की लिप्सा ने मनुष्य को अंधा बना दिया है | प्रकृति उसके लिए मुनाफ़ा कमाने की मशीनरी है | ऐसे में कवि का यह कहना कि घासों से मिलना दरअसल माँओं से मिलना है हमारे भीतर के मनुष्य को झकझोरने वाली बात है | कवि झाबुआ में सिर्फ घासें ही नहीं देखता | वह आगे कहता है - कितने फूलों से मिला / कितने शिशुओं से | फूलों का शिशुओं में बदल जाना कवि की गहन जीवन दृष्टि से ही संभव है | इस एक पंक्ति में न जाने कितने निर्दोष बचपन की खिलखिलाहटें दर्ज़ हैं | शैशव फूल ही तो हैं | इनका लालन पालन जरूरी है | ये भविष्य के बड़े बड़े वृक्ष हैं | इनसे ही फल बनेंगे | इनसे ही नए बीज तैयार होंगे | जीवन का चितेरा कवि आगे कहता है - कितनी खुशबुओं से मिला / कितनी कितनी वधुओं से | आप सहज ही अनुभव कर सकते हैं कि वधुएँ जहाँ खुशबू की तरह आती हैं वह जीवन कितना संगीतमय होगा | खुशबुएँ जीवन को तरोताजा कर जाती हैं | वे मन के ठहराव को तोड़ती हुई आती हैं और जीवन संगीत का झरना कलकल बहने लगता है | खुशबुओं को मनुष्य बहुत सहेज कर रखता आया है | खुशबुएँ मूल्यवान हैं | उनसे जीवन सँवरता है | झाबुआ में कवि इतना ही नहीं देखता | वह जीवन की कई और बेहतरीन छवियाँ लेकर आता है | वह कहता है - कितनी बूटियों से मिला / कितनी बेटियों से | अद्भुत छवि है यह कविता में | बूटियों की तरह बेटियाँ | जीवन के क्लेश हर लेने वाली | जीवन की औषधियाँ हैं बेटियाँ | मुझे नहीं लगता बेटियों को इस दृष्टि से कविता में पहले देखा गया है | झाबुआ में यह कवि जलाशयों से मिलता है तो भाइयों को याद करता है | भाई जो जीवन के संघर्षों में बराबर डट कर खड़ा होता है | जो जीवन की हर छोटी बड़ी लड़ाई में मोर्चे पर साथ खड़ा होता है | झाबुआ में प्रकृति और मनुष्य के इन ख़ूबसूरत रिश्तों को निहारने वाला यह कवि है प्रभात | इधर प्रभात की कविताओं ने हिन्दी के समकालीन कविता परिदृश्य में एक सार्थक हस्तक्षेप किया है | उनकी यह कविता है -झाबुआ में | वागर्थ के दिसंबर 2014 अंक में छपी है | झाबुआ मध्यप्रदेश का वह सीमान्त है जो गुजरात और राजस्थान से सटा हुआ है | प्रभात वहाँ की घासों , वहाँ के फूलों , वहाँ की खुशबुओं , वहाँ की बूटियों और वहाँ के जलाशयों से मिलते हैं तो माँओं , शिशुओं , वधुओं , बेटियों और भाइयों को याद करते हैं | जीवन का जो संगीत प्रभात झाबुआ में सुनते हैं और जिसे कविता में दर्ज़ करते हैं वह जीवन का सहज संगीत है - कर्णप्रिय और मधुर | उसमें वाद्यों का भारी शोर नहीं है | यह जीवन की सहज अवस्था है | कविता आगे बढ़ती है तो कवि इस सहज अवस्था बारे में भी बताता है जहाँ कोई यह नहीं कहता - हम ये करते हैं , हम वो करते हैं , हम ये हैं , हम वो हैं | यह एक ऐसी जगह है जीवन के भूगोल में जहाँ - सब अपने काम में लगे हैं , जीवन को सजा रहे हैं , जीवन में सजे हैं | यह एक ऐसा जीवन क्षेत्र है जहाँ लोग श्रम से थके थे , इंसान होने से नहीं थके थे | श्रम से थके इंसानों के भाल पर पसीने की बूँदों की ओस है जिसे निहार कर कवि लौटा है झाबुआ से | कविता में झाबुआ जीवन का सहज संगीत बनकर आता है | जहाँ कोई शोर नहीं है | इस संगीत के श्रवण के लिए किसी संगीत अकादमी की डिग्री नहीं बल्कि जीवन दृष्टि चाहिए | कविता के बारे में ऐसी कविताएँ हमें आश्वस्त करती है कि वह डीजे का कानफोडू संगीत नहीं है | यहाँ कोई एम्प्लीफायर नहीं है | यह धीमे धीमे बजता संगीत है | साँस रोककर . काम रोपकर इसे सुनने की जरूरत है | चमत्कार पैदा करनेवाली , घुमावदार मुहावरों के शब्दजाल में पाठकों को भरमाती चालू कविताओं के बरक्स ऐसी सहज कविताओं को ठहर कर देखे जाने की जरूरत है | अच्छी कविताओं का एक जरूरी एजेंडा अपने पाठकों का संस्कार करना भी है | वह अपने पाठकों के कानों को अनम्यूज़िकल से म्यूज़िकल बना सकती है अगर उसमें सच्चाई है |

अक्षर घाट - 42


सहजता भी कितनी सुन्दर होती है | कहा जाता है कि सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है | कविता में यह टेढ़ा काम निहायत खूबसूरती के साथ करते , अंगुली पर गिने जा सकने लायक , कुछ कवियों को पढ़ते हुए मन को बड़ी तसल्ली होती है | एक सहज सुन्दर कविता यकीनन जीवन में गहरे उतर कर ही लिखी जा सकती है | मैं यह नहीं कहूँगा कि इन दिनों अच्छी कविताएँ नहीं लिखी जा रही हैं | जैसा कि हिन्दी आलोचना अथवा समीक्षा का चालू सा रिवाज हो गया है इन दिनों | बहुत से चर्चित आलोचकों को पढ़ता हूँ तो कोफ़्त होती है | किसी कवि की कोई कविता पसंद आ गई तो वे इतना विह्वल हो उठते हैं कि एक लकीर खींच कर शेष हिन्दी कविता को ध्वस्त करके उसे खड़ा कर डालते हैं | कई झगड़े मोल ले लिए मैंने यह कहकर कि साहब एक को बेहतर साबित करने के लिए बाकी सबको कमतर आँकना जरूरी नहीं है | वे नाराज़ हो जाते हैं | मैं कहता हूँ जो ख़राब है उसे खराब कहिए , जो अच्छा है उसे अच्छा कहिए | कविता और आदमी दोनों अच्छे और बुरे होते हैं | जो आज अच्छा लिख रहा है वह कल बुरा भी लिख सकता है | जो आज बुरा लिख रहा है कल अच्छा नहीं लिख सकेगा ऐसा भी नहीं है | एक ही कवि के लिखे को उठा कर देख लीजिए | इसलिए कभी भी कवि विशेष के प्रति राग अनुराग का आधार उसका लिखा ही होना चाहिए | आज से चार साल पहले मुझे एक युवा कवि इसलिए पसंद था कि उसमें सादगी और ईमानदारी दिखती थी | आज उसमें बाजार की चमक दिखती है | वह कविता का फार्मूला लेकर चल रहा है | जीवन में डूब कर नहीं , जीवन का आभासी चित्र बनाता है और खूब रंग रोगन के साथ कविता खड़ा कर लेता है | जानता हूँ कि आज वह कविता का खिलाड़ी हो गया है | लेकिन अब वह मेरा उस तरह प्रिय भी नहीं है | मेरी वफादारी पहले कविता के प्रति है , कवि के प्रति नहीं | यह समझाना बड़ा कठिन है | मैंने कोशिश की है कि कविता के मार्फ़त कवि के पास जाऊँ | इस रास्ते के जोखिम हैं | लेकिन क्या किया जाए | कविता के खेत में निराई गुड़ाई बहुत जरूरी काम है | जो घास गेहूँ और सरसों के साथ उग आई है और मिट्टी से खाद पानी चूस कर केवल भविष्य का खर पतवार जमा कर रही है उसे उखाड़ फेंकने में कविता का किसान परहेज करेगा तो खेत में कुछ नहीं उगा पायेगा | जीवन में और समाज में आप देखते हैं कि रक्षणशीलता को बड़ा ख़राब माना जाता है | कहते हैं यार फलाँ आदमी बड़ा कंज़र्वेटिव है | जो कंज़र्वेटिव है वह प्रोग्रेसिव नहीं है यह तो सीधी सी बात है | तो कविता में भी यह नियम लागू होता है | अगर हम एक कवि को इसलिए महान मानते हैं कि उसने कभी कोई बढ़िया कविता लिखी थी या कि कुछ  बढ़िया कविताएँ लिखी थीं तो हम उसके प्रति रक्षणशील हैं | प्रगतिशील तो हम तब कहला सकते हैं जब हम उसकी हर नई कविता को नए सिरे से और हर संभव कसौटी पर कस कर देखें परखें और तब उसपर कुछ कहें | कविता के विषय में कुछ आलोचकों का यह भी मानना है कि जैसे अदहन में उबलते चावल का एक दाना चुटकी में लेकर बताया जा सकता है कि भात अब पक गया है उसी तरह कवि की एक कविता से उसके कवि कर्म के बारे में भी किसी नतीज़े पर पहुँचा जा सकता है | मुझे लगता है यह विषय को आवश्यकता से अधिक सरलीकृत करना है | कविता और चावल में कुछ मौलिक पार्थक्य भी तो होता है | हाँ यह एक मनोवैज्ञानिक पहलू जरूर है | अंग्रेजी में कहते हैं फ़र्स्ट इम्प्रेशन इज द लास्ट इम्प्रेशन | लेकिन यह मनोवैज्ञानिक पहलू बहुत दूर तक आलोचना के साथ नहीं चलता | लगातार अच्छा लिखते रहने वाले कवि भी होते हैं लेकिन साधारण तौर पर ऐसा बड़ा विरल हुआ करता है | इसके विपरीत लगातार खराब लिखने वाले कवि उतने विरल नहीं होते | यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ बहुत सारा भूसा है और थोड़ा अनाज है | आलोचक को इस भूसे के ढेर से कविता को गेहूँ के सुनहरे दानों की तरह अलगाना होता है | इसके लिए दँवरी करनी होती है | ओसाना पड़ता है | चलनी से चालना पड़ता है | तब जाकर एक गर्वीले किसान की तरह वह कह सकता है कि हाँ यह है सुन्दर अन्न | इधर कलकत्ता से निकल रही साहित्यिक पत्रिका वागर्थ के लागातार कई अंक हिन्दी कविता के पचास वर्षों के लेखा जोखा पर केन्द्रित रहे | बहुत कागद कारे करने के बाद भी कुछ उल्लेखनीय हासिल नहीं हुआ इस कवायद से | जो मूल गड़बड़ी इन लेखों में है वह यह कि बहुधा वे कवि को ध्यान में रखकर लिखे जा रहे हैं | सीधे सीधे कोई कविता उनके सामने प्रायः नहीं है | अधिकांश को शायद यह लगता हो कि नामों को नेपथ्य में रखकर कविता पर बात नहीं हो सकती | एक वरिष्ठ कवि का सन्देश मुझे भी मिला जिसमें कहा गया था कि फलाँ आलोचक ने बड़े महत्वपूर्ण ढंग से मेरी भी चर्चा की है | यह सच है कि उनकी सूची में सौ डेढ़ सौ नाम थे जिनमें एक नाम नील कमल का भी था | मुझे लगता है हमारे अध्ययन की पद्धति में गड़बड़ी है | किसी आलोचक की सूची में मैं या आप या कोई कवि हो या न हो यह उतना महत्व का विषय नहीं है जितना महत्व इस बात का है कि कोई कवि किसी आलोचक की सूची मैं है तो क्यों है या नहीं है तो क्यों नहीं है | देखा यह भी गया है कि एक कविता विशेष की बड़ी चर्चा इसलिए हो गई कि कविता अधिकांश लोगों की समझ में ही नहीं आई | इसके उलट एक कविता सिर्फ इसलिए उपेक्षित रह जाती है कि वह बड़ी सहज और आडम्बर से मुक्त है | क्या सहज कविता कोई भी लिख सकता है | सवाल है कि बड़ा कौन - कवि या कविता | आज कवि , कविता और आलोचना के त्रिकोण को नए चश्मे से देखे जाने की जरूरत है |



Saturday, March 28, 2015

अक्षर घाट -41

 
 
वे कविता से परिचय के बिलकुल शुरुवाती दिन थे । बिस्मिलाह बोले जाने की तरह । प्राथमिक भाषा ज्ञान के बाद हमने पढ़ना लिखना आरम्भ किया था । घर में मुझसे कुछ बड़ी बहन के साथ मैं भी उस लाल डायरी को बड़े प्यार से देखा करता था । वह डायरी एक रहस्य की तरह थी जहाँ हम बार बार जाते । हम जिस उम्र में थे हमारे लिए यह जानना संभव नहीं था कि कविता होती क्या चीज़ है । कुछ कुछ गीतों की तरह जानते थे हम कविता को । उस समय के बारे में अभी इतना याद अवश्य है कि स्कूल में अंग्रेज़ी और हिन्दी के साथ हमें गुरुमुखी भी सिखाई जाती थी । भोजपुरी के संस्कार थे हमारे । गीत गवनई से परिचय भी था । हमारे स्कूल में प्रार्थना में रोज गाये जाने वाले गीत गुरुमुखी भाषा में होते थे । दे शिवा वर मोहे अहे निज करमन ते कबहूँ न टरौं । उस लाल डायरी में हम गाये जाने लायक गीत तलाश करते थे । और इसी लिए हम बार बार उसकी तरफ आकर्षित भी होत्ते थे । वह बाबूजी की कविताओं की डायरी थी । बाबूजी की डायरी में बाबूजी के लिखे गीत और कविताओं के अलावा ऐसे भी कुछ गीत नोट थे जो बाबूजी को पसंद थे और जिन्हें वे अक्सर गुनगुनाया भी करते थे । 
बाबूजी की कविताएँ बिलकुल छायावादी दौर की कविताओं की तरह थीं ऐसा अब समझ में आता है । यह सोच कर भी हमें आज रोमांच होता है कि तब जयशंकर प्रसाद ,सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ,हरिवंश राय बच्चन सशरीर हिन्दी कविता में उपस्थित थे । बाबूजी तब बनारस के उदय प्रपाप कॉलेज में थे । वह हिन्दी कविता का वह दौर था जब कवि सम्मलेनों में गंभीर कविता के लिए जगह थी और सस्ती लोकप्रियता ने कविता को मसखरेपन में नहीं बदल दिया था । बनारस और इलाहाबाद तब हिन्दी कविता और साहित्य के मक्का मदीना हुआ करते होंगे इस बात की हम कल्पना कर सकते हैं । कवि सम्मलेन देर शाम शुरू होते और रात भर सुनने वाले जमे रहते । वह लाल डायरी हमें आज भी बहुत प्रिय है तो इसलिए कि उससे हिन्दी कविता की एक जीवंत परंपरा की गंध आज भी आती है । 
लेकिन अभी ,बिलकुल अभी उस डायरी को याद करने का एक भिन्न प्रसंग भी है । उसके पन्नों पर यत्र तत्र अंग्रेज़ी लिखावट में कुछ बचकानी टिप्पणियाँ दर्ज़ हैं । दिस इज़ ए गुड पोएम । दिस इज़ बैड पोएम । ऐसा ही कुछ । और वह लिखावट हमारी ही है इसमें कोई संदेह नहीं । वह पेन्सिल की लिखावट मेरी खुद की या बहन की ही हो सकती है । लेकिन आश्चर्य कि हमें इस गुस्ताखी के लिए न कभी डाँट पड़ी और न कभी मार ही पड़ी । वे टिप्पणियाँ अब भी यथावत बनी हुई हैं । हमें अपनी मूर्खता अब समझ में भी आती है । होता यह था कि जो कविताएँ गेय होती थीं वे हमें पसंद भी आती थीं । कहना चाहिए कि वे ही कविताएँ हमें सबसे ज्यादा पसंद आती थीं । हम उन्हें किसी लोकगीत वगैरह की धुन पर गा भी लिया करते थे । उम्र कम थी हमारी और कविता के पास जाने का सलीका भी नहीं था । इसलिए जो छंद में नहीं था उसके प्रति एक अस्वीकार का भाव तब हमारे मन में सहज ही बना रहता था । लेकिन जो अन्य कविताएँ उस डायरी में पढ़ी थीं उनके कथ्य आज भी याद आते हैं । कुछ की तो पंक्यियाँ भी याद आती हैं । एक कविता एक भाई की तरफ से लिखी गई थी जिसमें छोटी बहन के बिछोह की मर्मस्पर्शी छवियाँ हैं । एक दूसरी कविता भारत चीन के युद्ध के समय लोक के भावात्मक उद्वेग को लेकर थी । और हाँ कुछ नितांत व्यक्तिगत राग अनुराग की कविताएँ भी हैं वहाँ जिन्हें अब प्रकाशित करवाने की इच्छा होती है कभी कभी लेकिन बाबूजी ने कभी अपनी कविताओं को कहीं भी छपने के लिए नहीं दिया । आज भी कहते हैं कि ये सब तो स्वान्तःसुखाय रचनाएँ हैं इन्हें क्यों छपना चाहिए । 
वह लाल डायरी मुझे इस बात का अहसास अब भी कराती रहती है कि कविता के पाठक को किसी भी कविता को पसंद या नापसंद करने का अपना अधिकार होता है । वह अधिकार उसके पास होना भी चाहिए | वैसे ही जैसे हम बाबूजी की डायरी में कविताओं के बारे में अच्छा बुरा कुछ भी लिख सकते थे । कविता के पास उसका पाठक भी तो उसी तरह जाता है जिस तरह हम जाया करते थे डायरी वाली कविताओं के पास । हम पाठक को कभी कुछ भी भला बुरा नहीं कह सकते । ठीक वैसे ही जैसे हमें कभी बाबूजी ने भला बुरा नहीं कहा । कवि-कविता और पाठक- आस्वादक के बारे में सोचते हुए बहुत याद आती है वह लाल डायरी । वह डायरी जिस दौर में लिखी जाती रही होगी वह समय मेरे जन्म से भी पहले का है | साठ का दशक | और यह अनुमान का विषय है कि तब बाबूजी जैसे और भी बहुत से लोग जो कवि-कर्म से जुड़े रहे होंगे और अनासक्त अपना काम करते रहे होंगे उनकी संख्या कितनी होगी | किसी भी दौर में साहित्य की पृष्ठभूमि में काम करने वाले लोग कम नहीं होते | उन्हें शोहरत की भूख नहीं होती | मान-सम्मान की लालसा उन्हें नहीं सताती | आज भी ऐसे लोग कहीं न कहीं जरूर होंगे | साहित्य में यह प्रजाति संख्या में कम भले होती गई हो किन्तु विलुप्त अब भी नहीं हुई | वे कविता इसलिए लिखते हैं कि इससे उन्हें आनंद प्राप्त होता है | इसके माध्यम से वे अपने आस-पास के लोगों को आनंद का अनुभव करवाते हैं | यही उनका हासिल होता है | इतिहास में दाखिल होने की कोई हड़बड़ी इन्हें नहीं होती | वे हर तरह की दौड़ से खुद को बाहर रखते हैं | कहाँ वह साठ का दशक और कहाँ यह इस नई सदी का दूसरा दशक | कितना कुछ बदल गया है और ऐसे में ये कैसी बातें कर रहा हूँ मैं - ये पिडली सी बातें !