Friday, October 14, 2016

लिख चुकने के बाद इन शब्दों को पोंछ कर साफ कर देना..

◆एक कविता है जिसमें कुछ सूत्र एक किसान पिता अपने बेटे को देता है । यह किसान अपने बेटे को जो सूत्र देता है वह एक प्रकार से वर्जनाओं और  निषेधाज्ञाओं की एक सूची है । यह मत करना , वह मत करना । यहाँ मत  जाना, वहाँ मत जाना । ऐसे मत देखना, वैसे मत देखना । इस तरह की तमाम नसीहतें वह अपने बेटे के लिए करता है ।

◆कुछ सूत्र जो एक किसान बाप ने बेटे को दिए (कविता) : केदारनाथ सिंह 
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मेरे बेटे
कुँए में कभी मत झाँकना
जाना
पर उस ओर कभी मत जाना
जिधर उड़े जा रहे हों
काले-काले कौए

हरा पत्ता
कभी मत तोड़ना
और अगर तोड़ना तो ऐसे
कि पेड़ को जरा भी
न हो पीड़ा

रात को रोटी जब भी तोड़ना
तो पहले सिर झुकाकर
गेहूँ के पौधे को याद कर लेना

अगर कभी लाल चींटियाँ
दिखाई पड़ें
तो समझना
आँधी आने वाली है
अगर कई-कई रातों तक
कभी सुनाई न पड़े स्यारों की आवाज
तो जान लेना
बुरे दिन आने वाले हैं

मेरे बेटे
बिजली की तरह कभी मत गिरना
और कभी गिर भी पड़ो
तो दूब की तरह उठ पड़ने के लिए
हमेशा तैयार रहना

कभी अँधेरे में
अगर भूल जाना रास्ता
तो ध्रुवतारे पर नहीं
सिर्फ दूर से आनेवाली
कुत्तों के भूँकने की आवाज पर
भरोसा करना

मेरे बेटे
बुध को उत्तर कभी मत जाना
न इतवार को पच्छिम

और सबसे बड़ी बात मेरे बेटे
कि लिख चुकने के बाद
इन शब्दों को पोंछकर साफ कर देना

ताकि कल जब सूर्योदय हो
तो तुम्हारी पटिया
रोज की तरह
धुली हुई
स्वच्छ
चमकती रहे ।

◆यह एक ग्रामीण पृष्ठभूमि का खेतिहर किसान है जो कविता में अपने पुत्र को संबोधित कर रहा है । किसान की उम्र क्या है या कि उसके पुत्र की उम्र क्या है इसका कोई संकेत कविता में नहीं है तथापि यह माना जा सकता है कि एक पिता का यह उपदेशात्मक रूप है जिसका उद्देश्य हर हाल में पुत्र के लिए सुख शांति की कामना और आसन्न संकटों के प्रति उसे सावधान कर देना है । हालांकि पटिया पर लिखने और उसे पोंछकर साफ रखने की नसीहत से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किसान पिता के इस बेटे के अभी पटिया पर लिखने के दिन हैं । अन्यथा यहाँ कागज़ और कलम की बात होती । कागज़ कलम दावात और किताबें या तो इस किसान परिवार तक अभी पहुँची नहीं हैं या फिर वह इन्हें अफोर्ड कर पाने की स्थिति में नहीं है, यह सहज अनुमान का विषय है ।

◆किसान पिता कहता है कि कुँए में कभी मत झाँकना । यहाँ विचारणीय यह है कि इसके पीछे उसकी मंशा क्या हो सकती है । कुँए से रिश्ता प्यास का है । प्यास और पानी का रिश्ता है यह । ग्रामीण कुँओं की बनावट पर ध्यान दें तो हम पाएँगे कि जगत वाले बँधे कुँए अमूमन कम घरों में होते हैं । ज्यादातर बिना जगत के सामान्य खुले मुँह वाले कुँए होते हैं । उनमें भी निजी कुँए संख्या में कम होते हैं । ज्यादातर सार्वजनिक अथवा साझा उपयोग के लिए होते हैं । आमतौर पर बच्चों को कुँए के पास जाने से मना किया जाता है जिसके पीछे भावना उसके कुँए में गिर जाने के खतरे से बचाने की ही होती है । लेकिन बात इतनी ही नहीं है । बहुत सारे अन्धविश्वास भी कुँए से जुड़े होते हैं और यह ग्रामीण जीवन का यथार्थ है । गाहे बगाहे कोई कुँए में कूद कर आत्महत्या कर चुका होता है और लोग मानने लगते हैं कि उसका भूत कुँए में रहता है । कुँए में झाँकना एक स्वाभाविक क्रिया है । प्राथमिक रूप से यह कौतूहल है । जिज्ञासा है कि कुँए में क्या है, यह दिखता कैसा है । ग्रामीण जीवन की रोजमर्रा की जिंदगी में कुँए और तालाब अपना खास महत्व रखते आए हैं । ये ऐसी जगहें हैं जो अपरिहार्य हैं । यह किसान पिता बेटे को कुँए पर जाने से नहीं बरज रहा है बल्कि कुँए में झाँकने से मना कर रहा है ।

◆यह पिता बेटे को उस दिशा में जाने से मना करता है जिधर काले कौए उड़े जा रहे हों । कौओं के लिए काले-काले विशेषण का प्रयोग है । स्वाभाविक रूप से कौए तो काले ही होते हैं । कुछ अधिक काले भी होते हैं । और कौओं को तो घरों में वह सम्मान हासिल है जो पितरों को हासिल होता आया है । कौए की चोंच सोने से मढ़वाने के किस्से कौन नहीं जानता होगा । ये कौए आगत के आने की सूचनाएँ देते हैं, ऐसी मान्यताएँ भी रही आई हैं । और अव्वल बात यह कि ये कौए ही हैं जो परिवेश की गंदगी को कम करने में सहायक भूमिका निभाते हैं । यह पिता बेटे को कौओं की दिशा में जाने से मना कर रहा है । क्यों ? क्या इसलिए कि उस ओर गंदगी के होने की संभावना है ?

◆यह पिता कहता है कि हरा पत्ता कभी मत तोड़ना, और तोड़ना तो ऐसे कि पेड़ को ज़रा सी भी पीड़ा न हो । विचारणीय है कि भारतीय किसान की मूल संवेदनाएँ क्या हैं । स्मरण रहे कि एक साधारण किसान (केदारनाथ सिंह के ज़माने के किसान को ध्यान में रखें)  रोज़ सुबह उठकर ईश्वर को याद करने के बाद सबसे पहले दुआर-आँगन पर लगे नीम के पेड़ की टहनी से एक दातून तोड़ता है । हाथ न पहुँचे तो लाठी से मार गिराता है किसी एक नाज़ुक टहनी को । और इसके लिए वह नीम के पेड़ को धन्यवाद भी नहीं कहता । यह उसकी रूटीन का हिस्सा है । वह यह नहीं सोचता है कि नीम के पेड़ को इस हरकत से पीड़ा भी पहुँच सकती है । लेकिन केदार जी का  किसान अपने बेटे से कह सकता है कि हरा पत्ता कभी मत तोड़ना ! किसान की मूल संवेदना धरती से जुड़ी होती है । माटी से जुड़ी होती है । पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी उसके लिए धरती का ही विस्तार हैं । उसका कृतज्ञता-बोध मूल रूप से धरती के प्रति है, माटी के प्रति है । वह धरती को माँ कहता और मानता है । स्मरण रहे कि यह किसान जितना सरल अपने आचार में दिखाई देता है उतना सरल उसका व्यवहार नहीं हुआ करता । कई बार तो वह इतना स्वार्थी और चालाक होकर पेश आता है कि आप हैरत में पड़ जायेंगे । मैं आपको इसका प्रमाण एक उदाहरण से देता हूँ । यह किसान सिर्फ रोपनी ही नहीं करता है, वह खेतों में उतर कर सोहनी भी करता है । समझने के लिए गेहूँ का ही उदाहरण ले लीजिए । बुवाई के बाद जब खेतों में गेहूँ के पौधे तैयार होने लगते हैं तब इन पौधों के बीच कुछ ऐसे पौधे भी उग आया करते हैं जो किसान के लिए सर्वथा अवांछित और अप्रयोजनीय होते हैं । परंपरागत किसान खेतों में जाकर इन्हें उखाड़ फेंकता है । ये अवांछित पौधे आधुनिक विज्ञान की शब्दावली में वीड्स कहलाते हैं । आधुनिक किसान इनके नाश के लिए वीडिसाइड रासायनिक का प्रयोग करता है । स्मरण रहे कि अवांछित पौधे के साथ किसान की कोई संवेदना नहीं जुड़ती है, भले ही वह कितना भी हरा भरा क्यों न हो । वह उसे नष्ट कर देता है । किस तर्क से यह किसान पिता अपने बेटे से कह सकता है कि हरा पत्ता देखो तो उसे तोड़ो मत और तोड़ो तो ऐसे कि पेड़ को पीड़ा न हो । कृतज्ञता यदि है तो वह सभी पेड़ पौधों के प्रति सामान रूप से होगी । ऐसा तो नहीं हो सकता कि तुलसी के प्रति वह कृतज्ञ है और नीम की टहनी को रोज ध्वस्त करता है । यह किसान शाक-सब्ज़ी भी बोता ही है । तो किस तर्क से वह उन हरे पत्तों को तोड़ कर खा जाता है ? कहाँ जाती है तब उसकी कृतज्ञता ? स्मरण रहे कि पूरी की पूरी कृषि व्यवस्था एक तरह से प्रकृति का दोहन है । और किसी भी पेड़ के पुष्पित पल्लवित होने की प्रक्रिया में विकास के किसी भी चरण में मानवीय हस्तक्षेप उसे पीड़ा पहुँचाए बग़ैर मुमकिन नहीं है ।

◆इस पिता की हिदायत है कि रोटी तोड़ने से पहले गेहूँ के पौधे को सिर झुका कर याद करना जरुरी है । यह एक रोमांटिक किस्म की हिदायत है । और न सिर्फ रोमांटिक है बल्कि अव्यवहारिक भी है । एक साधारण किसान परिवार में भोजन की थाली में रोटी के साथ भात, दाल, तरकारी आदि भी होते हैं । चोखा चटनी भी । तो बच्चा खाने से पहले बारी-बारी से गेहूँ, धान, अरहर, आलू, नेनुआ, लौकी, धनिया, मिर्च सभी पौधों को सिर झुका कर याद करे फिर तो !  वास्तव में जो परंपरा में है वह है कि खाने से पहले धरती के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है । धरती का कौर चौके में थाली से बाहर रख दिया जाता है । बाद में यह पशु पक्षियों के काम आ जाता है या घर के मवेशियों को डाल दिया जाता है । ये बातें व्यवहार में रही आई हैं । 

◆किसान पिता की एक सीख यह है कि लाल चींटियों को देखना तो समझना आँधी आने वाली है । किसान जीवन की खासियत यह भी है कि ऋतुओं को समझने के उसके अपने कुछ नुस्खे रहे हैं । इसके पीछे वैज्ञानिक निरीक्षण परीक्षण की वैसी भूमिका नहीं हुआ करती बल्कि दीर्घ अनुभव और अवलोकन को ही आधार बनाया जाता है । कई दफ़ा अनुभव अवलोकन से अर्जित और विकसित ये मान्यताएँ धीरे धीरे रूढ़ियों में बदल जाती हैं । पीढ़ी दर पीढ़ी वैज्ञानिक समझ के आभाव में इन रूढ़ियों को मान्यता प्राप्त होती जाती है । लाल चींटियों का आँधी के साथ इस तरह एक समीकरण बैठा लिया जाता है । यूँ भी परंपराओं में सब कुछ वैज्ञानिक कहाँ होता है । इसी प्रकार किसान पिता आगे यह भी बताता है कि बहुत दिन अगर सियारों की आवाज़ न आए तो समझना चाहिए कि बुरे दिनआने वाले हैं । इसे उलट कर पढ़ा जाए तो सियारों की आवाज़ का आते रहना अच्छे दिन के लक्षण हैं ? क्या वास्तव में ऐसा है ? एक ग्रामीण जैविकी में सियारों की भूमिका पर विचार किया जा सकता है । ये पालतू नहीं होते और दिन के उजाले में गाँव की आबादी में नज़र भी नहीं आते । सिवान में छुप छुपा कर रहने वाले ये प्राणी इस जैविकी में स्थानीय पारिस्थितिकी यानि इकोसिस्टम में एक रोल जरूर प्ले करते हैं । सियारों की हुआँ हुआँ का दीर्घ  अवधि तक न सुना जाना अधिक से अधिक यह संकेत दे सकता है कि पारिस्थितिकी के संतुलन में कहीं कोई गड़बड़ी आ गई है । बहरहाल, अच्छे दिन और बुरे दिन के इन संकेतों के पीछे कोई वैज्ञानिक समझ नहीं काम कर रही है किसान पिता के मन में । वह सुनी सुनाई बात को अपने बेटे तक कम्युनिकेट भर कर रहा होता है । 

◆यह किसान पिता अपने बेटे से कहता है कि बिजली की तरह कभी मत गिरना । वह अनुभव से जानता है कि बिजली का गिरना विध्वंश का परिणाम लेकर आता है । वह आगे कहता है कि बिजली की तरह अगर कभी गिरना तो दूब की तरह उठ खड़े होने के लिए तैयार रहना । कविता में यह एक ऐसा बिंदु है जहाँ जीवनानुभव काव्य में ढलता हुआ दिखता है । एक ओर चरम विनाश और दूसरी ओर अदम्य जिजीविषा । कविता में यह अकेली जगह है जहाँ परम्परावाद के बर-अक्स जीवनानुभव बोलता हुआ दिखता है । थोड़ी फिलॉसफी, थोड़ा पोएटिक एस्सेन्स और एक किस्म का द्वंद्व यहाँ उभरते हुए दिखते हैं । यह कविता का हाई प्वाइंट है । कविता का ग्राफ़ तलहटी से उठ कर थोड़ा ऊपर जाता हुआ प्रतीत होता है । किंतु अगली ही पंक्ति में यह ग्राफ़ पुनः अपनी तलहटी को छूता हुआ नज़र आता है जब किसान पिता बेटे के लिए अगली नसीहत पेश करता है । 

◆यह पिता कहता है कि अँधेरे में अगर रास्ता भूल जाओ तो ध्रुव तारे पर भरोसा मत करना । वह आगे कहता है कि दूर से आती कुत्तों के भौंकने की आवाज़ पर भरोसा करना । यह कविता का सबसे लो-प्वाइंट है । ध्रुव तारा, जिसपर दुनिया को भरोसा है, जो अटल है, उस पर अँधेरे में भटकने पर दिशा निर्धारण के लिए भरोसा करने का ही निषेध है यहाँ । दूर से आती कुत्ते की आवाज़ इस पिता को अधिक भरोसे के काबिल लगती है । यह दिशा ज्ञान का कौन सा शास्त्र है ? जिस ग्रामीण समाज में रात के अँधेरे में बिना घड़ी की सहायता के किसान तारों का अवस्थान देख कर समय का आकलन कर लेता है उसी व्यवस्था में यह किसान पिता भटक जाने की स्थिति में बेटे से कह रहा है कि दूर से आती कुत्ते की आवाज़ सुनो । और अगर अलग अलग दिशाओं से एक साथ कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनाई दे तब बेटा क्या करेगा ? कुत्ते के भौंकने की आवाज़ का निहितार्थ क्या है ? यही न कि उस तरफ आबादी है । बेटा किसी बस्ती में आवाज़ का सूत्र पकड़ कर पहुँच तो जाएगा । लेकिन उसी बस्ती में उसका घर होगा इसकी कोई गारंटी नहीं । 

◆किसान पिता की समझ तब और प्रकट होती है जब वह बेटे को सतर्क करता है कि बुधवार को उत्तर दिशा में मत जाना और इतवार को पश्चिम दिशा में मत जाना । यह पिता भयंकर रूप से कुसंस्कारी, अंधविश्वासी और दकियानूसी ख्यालात वाला है इस बात में  कोई संदेह नहीं रह जाता है । इस किसान पिता का ज्ञान विज्ञान से दूर दूर तक कोई नाता नहीं है । वह अपने जाने भोगे को ही अंतिम सत्य मानता है । 

◆कविता का ग्राफ एक उभार वाले बिंदु को छोड़ कर शुरू से आखिर तक सपाट है । और कविता की फिनिशिंग अतिरिक्त चेष्टा की तरह अलग से कविता में टाँक दी गई पंक्ति के साथ होती है । यहाँ कविता एक नाटकीय मोड़ लेती है । किसान पिता अब बेटे से कहता है कि लिख चुकने के बाद  इन शब्दों को पोंछ कर साफ कर देना । और रेखांकित करने लायक बात यह है कि पिता इस हिदायत को सबसे बड़ी बात कहता है । इसकी वजह भी खुद किसान पिता ही स्पष्ट कर देता है । वह कहता है कि लिख चुकने के बाद इन शब्दों को इसलिए पोंछ कर साफ कर दो ताकि अगली सुबह पटिया रोज की तरह धुली हुई, स्वच्छ चमकती रहे । यहाँ दो बातें हैं गौर करने लायक । एक यह कि पिता की यह उपदेशात्मकता बेटे के लिए रोज रोज घटित होने वाली बात है । इन उपदेशों को उसे पटिया पर रोज ही लिखना भी है लेकिन फिर इस लिखे को पोंछ भी देना है । इस लिखने और पोंछने के दरम्यान जो कार्यवाही है उसमें निश्चित रूप से लिखे तो स्मृति में सुरक्षित कर लेने जैसी बात है या कहें कि कंठस्थ कर लेना है उसे । अगली सुबह पाटिया साफ सुथरी चाहिए । अगली सुबह उसे नए शब्द लिखने होंगे शायद । दूसरी बात यह कि आग्रह पाटिया के धुले स्वच्छ और चमकदार होने पर भी है । यहाँ विचार किया जाए तो पटिया का सौंदय, उसकी उपयोगिता उसके स्वच्छ धुले और चमकीले होने में नहीं है । बहरहाल ये जो सूत्र इस किसान पिता ने पुत्र को दिए हैं उनमें भारी कवित्व जैसा तो कुछ नहीं ही है, कविता होने का अहसास ये सूत्र भले ही देते हों । 

◆और अंत में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन पंक्तियों के लेखक ने इस कविता के अधिकांश को अभिधा में ग्रहण किया है । इन पंक्तियों के लेखक का मानना है कि एक पिता का पुत्र से उपदेशात्मक शैली में संवाद अभिधा में ही संभव है । इन पंक्तियों के लेखक का यह भी मानना है कि यह पिता जब बेटे से कहता है कि हरा पत्ता कभी मत तोड़ना तो यहाँ हरा मतलब हरा ही होता है , पत्ता मतलब पत्ता ही होता है और तोड़ना मतलब तोड़ना ही होता है । यूँ तो बीज के अंकुरण से लेकर पेड़ के बड़े होने के बीच पत्तों के उगने और गिरने की जैविक व्यवस्था  पेड़ स्वतः ही करता है और इसके वैज्ञानिक कारण हैं ।  पिता पुत्र के संवाद में काव्य-कौशल की गुंजाइश कम ही हुआ करती । किसान पिता की भाषिक उपलब्धि उसके द्वारा प्रयुक्त मुहावरों और लोकोक्तियों में झलकती है । पुत्र से संवाद करते हुए  रूपकों बिम्बों और अलंकारों की दरकार उसे नहीं होती । वह यथासंभव साफ़ साफ़ और दो टूक बातें कहता है ।

◆सन्दर्भ ::
यह लंबी टिप्पणी क्यों ? यह कविता इतनी दुर्बोध तो नहीं थी कि इसपर अतिरिक्त टिप्पणी की आवश्यकता पड़ती । इससे पूर्व कविता के एकांश (हरा पत्ता कभी मत तोड़ना..) पर एक छोटी टीप लिखी गई थी, (जिसे नीचे अक्षरशः उद्धृत किया जा रहा है) जिसपर कई आपत्तियों के साथ एक प्रधान आपत्ति थी कि इसे सन्दर्भ से काट कर प्रस्तुत किया गया । इसलिए पूरी कविता पर इस टिप्पणी का प्रयोजन बना । अन्य आपत्तियाँ इसके पाठ को लेकर थीं जिसका फैसला कविता के सचेत पाठक स्वयं करें तो बेहतर ।

◆मूल टिप्पणी ::
हरा पत्ता
कभी मत तोड़ना
और अगर तोड़ना तो ऐसे 
कि पेड़ को ज़रा भी
न हो पीड़ा...

-केदारनाथ सिंह

इस प्रारूप की कविताएँ हिन्दी कविता की क्रॉनिक बीमारी हैं । कल इसे राजकमल प्रकाशन के फेसबुक वॉल पर पढ़ा तो लगा कि बात होनी चाहिए ऐसी कविताओं पर । और किसी नए कवि की कविता को सामने रखने से बेहतर होगा एक भारी कवि की कविता को सामने रख कर बात करना ।

कविता में दो बातें हैं । पहली बात, कि हरा पत्ता कभी मत तोड़ना । क्यों ? कारण नहीं बताया गया है । पूरी की पूरी कृषि सभ्यता पर सवाल है यह एक पंक्ति । हरा पत्ता मनुष्य सहित बहुतेरे जीवों का आहार है, जो शाकाहारी हैं । दूसरी बात, कि तोड़ना तो ऐसे कि पेड़ को ज़रा भी पीड़ा न हो । वह कैसे ? यह एक प्रमाणित सत्य है कि पेड़ भी सजीव है । तो पीड़ा तो होगी , यह अवधारित है । अपने आप कोई पत्ता झड़ जाए तो बात अलग है । यह तो हुई अभिधा की बात ! यहाँ क्या कोई व्यंजना है ? अधिक से अधिक एक ऐडवाइस खोज निकाली जा सकती है कि प्रकृति में हस्तक्षेप करते वक़्त ध्यान रखना होगा कि पर्यावरण को क्षति न पहुँचे, हालांकि कविता ऐसा कुछ कहना चाहती है इसको लेकर यथेष्ट संदेह है । तो क्या है इस कविता में ?

इस कविता में अदायगी है ! जैसे देवानंद का लहरा कर चलना, जैसे राजेश खन्ना का सिर को झटकना, जैसे शाहरुख़ खान का बाहें फैलाना । और इस अदा की तो कई पीढ़ियाँ दीवानी पाई गई हैं । अगर मैं लिखूँ - उसे कभी मत मारना, और मारना तो ऐसे कि उस आदमी को न हो पीड़ा ; तो कौन इसे कविता मानेगा ? लोग मारने के लिए दौड़ा लेंगे । लेकिन बात हरे पत्ते की है, पेड़ की है । इसलिए एक छुपी हुई रुमानियत पढ़ने वाले को भरमा ले जाती है ।

खूब कविताएँ लिखी गई हैं हिन्दी में इस अदा वाली । खूब लिखी जा रही हैं । और लुभा भी रही हैं । यह लहू बहाए बिना ही क़त्ल करने की अदा है ।

प्लीज़ करेक्ट मी इफ़ आइ ऐम मिसटेकेन ।

◆ नील कमल 
neel.kamal1710@gmail.com

Sunday, August 23, 2015

अक्षर घाट -66

ईश्वर को धर्म में आस्था रखने वाले लोग परमपिता भी कहते हैं | इस पृथ्वी पर उसी ईश्वर की एक मिनियेचर सत्ता पिता के रूप में प्रतिष्ठित है | पिता पर हिन्दी में कुछ अच्छी कविताओं की अगर आप को तलाश हो तो आपको मनोज छाबड़ा का नया संग्रह देखना चाहिए | तंग दिनों की खातिर उनवान से छपी इस किताब की पिता और पुत्र शीर्षक दो कविताएँ खास तौर से देखी जानी चाहिए | माता और पिता पर लिखते हुए ज़्यादातर कवि भावुकता के शिकार हो जाते हैं और ऐसा करते हुए वे जरूरी तटस्थता नहीं बरत पाते | एक सीधी सी बात यहाँ मुझे कहनी है और वो ये कि जिस सत्ता के सात पर्दों को भेदकर आप सत्य को उद्घाटित करने का भ्रम पाले रहते हैं उस सत्ता के मिनियेचर फॉर्म से आपके निजी समीकरण किस तरह सधते हैं यह जानना आपके पाठक के लिए बहुत मददगार साबित होता है | पुराणों से और जनश्रुतियों से आप चाहें तो खँगाल कर बहुत सी कहानियाँ ला सकते हैं जिनसे यह साबित किया जा सकता है कि पिता की एक इच्छा पर अपना जीवन दाव पर लगा देने वाले पुत्रों की परम्परा ही समाज में स्वीकृत और प्रसंशित होती रही है | समकालीन हिन्दी कविता में कई कवियों ने पिता को अपनी कविताओं में याद किया है | तत्काल मुझे सुरेश सेन निशांत की कविता याद आ रही है जिसमें कवि अपने पिता के गमछे को याद करता है | एकांत श्रीवास्तव की एक कविता है जिसमें वे पिता की घड़ी को याद करते हैं | इन कविताओं की खासियत यह रही है कि इनमें पिता की ईश्वरीय छवि अपने आभा-मण्डल के साथ मौजूद रहती है | इन कविताओं में पिता के उस रूप से कवि कहीं नहीं टकराता है जो कि उस सार्वभौम सत्ता की एक इकाई के रूप में अपने परिवार में गण्य होता है और अपवाद की बात अगर जाने दें तो निर्विवाद और निरंकुश सत्ता का स्वामी होता है | मुझे बार बार यह कहने की जरूरत महसूस होती है कि इस पहलू को सामने रखकर लिखी गई कविताओं पर बात की जानी चाहिए | मैं यहाँ अपनी कविताओं का उदाहरण देना उचित नहीं समझता क्योंकि ऐसा करना न सर्फ अशोभनीय होगा बल्कि गैर जरूरी भी | मनोज इस लिहाज से मुझे अपनी मनोभूमि के बहुत निकट खड़े मिलते हैं और इसीलिए उनकी ये कविताएँ मुझे अधिक प्रभावी ढंग से अपील करती हैं |
मनोज समकालीन हिन्दी कविता के उन जरूरी कवियों में से हैं जिनका नाम मैं किसी आलोचक या समीक्षक की सूची में नहीं पाता | और ऐसे तमाम कवि मेरे लिए खास महत्व के हैं जो प्रायोजित चर्चा के चकाचौंध से दूर अपनी मद्धम लौ के साथ अपनी कविताओं में लिखते बोलते रहे हैं | मनोज स्वभावतः सूक्ष्म संवेदनाओं के कवि हैं | नागरिक जीवन के प्रामाणिक चित्र उनकी कविताओं में देखे जा सकते हैं | दृष्टि की भिन्नता ही कवि की अपनी पहचान की निर्मिति में जरूरी भूमिका अदा करती है | आप देखें कि जो अनुभव एक पिता की पूँजी के रूप में देखा जाता रहा है उसे मनोज अपनी कविता में किस दृष्टि से देखते हैं | वे कहते हैं – अनुभव / एक टोटका है बाज़ार में/ जिसके उत्तर में/ कोई प्रश्न नहीं उठ सकता/ सफ़ेद बालों की दुहाई देकर/ अगली पीढ़ी कि जुबान पर/ ताला लगाया जा सकता है/ जवानी के गुब्बारे में/ अनुभव की सुई/ धमाकेदार अहसास कराती होगी पिताओं को/ इस अमोघशस्त्र से/ पराजित किया जा सकता है/ तमाम पुत्रों को/ और परिवार के मानचित्र से/ आखिरकार पुत्र को हो जाना पड़ता है निष्कासित | यहाँ मनोज पिता नाम की सत्ता के सबसे मजबूत दुर्ग पर ही अपना मोर्चा खोल लेते हैं | और यह अकारण नहीं है | इसके पीछे कवि कवि की अपनी युक्ति है, उसके अपने तर्क हैं | वह कहता है –पराजयों और हताशा का दूसरा नाम/ अनुभव है/ निराशा और अपमानों की/ जमापूंजी का कुल जोड़ ही हैं/ पिता के अनुभव | और इसी तर्क-पद्धति के जरिए मनोज कह पाते हैं –यह युग/ पिताओं की मनमानी का है/ उसे (पुत्र को) केवल संघर्ष करना है/ पिता की आक्टोपसी जिद से/ खींच निकालनी हैं/ इच्छाएँ अपनी/ उनके हठ को पी जाना है चुपचाप/ उनके ढहते भरभराते खंडहर की नींव में/ झोंक देनी हैं/ अपनी आकांक्षाओं की मीनारें |
हम जिस भारतीय संस्कृति की दुहाई अक्सर दिया करते हैं उसमें राजा ईश्वर का प्रतिनिधि माना गया है इसलिए उसे निरंकुश सत्ता हासिल है | इस सत्ता की सार्वभौम स्वीकार्यता स्वयंसिद्ध है | पिता जो कि एक परिवार में लगभग एक राजा जैसी हैसियत रखता है स्वाभाविक रूप से सत्ता की वही निरंकुशता उसे भी हासिल होती है | हमारे यहाँ बंगाल में तो परिवार के मुखिया को कर्ता कहने की परम्परा रही है जिसका भावार्थ स्वामी के निकट का रहा है | तो कहने का अर्थ यह कि किसी भी कवि का सत्ता विमर्श कितना टाइम-टेस्टेड है यह देखने और जानने का एक उपक्रम यह भी है कि पिता के सत्ता-चरित्र के प्रति उसकी दृष्टि क्या और कैसी है | वह इस मिनियेचर सत्ता से किस मात्रा में और किस तरह टकराता है | इस द्वंद्वात्मकता में उसका पावर डिसकोर्स विकसित होता है | मनोज की पिता शीर्षक कविता की आरंभिक पंक्तियाँ इसी तनाव को संबोधित करती हैं –पिता/ इस समय/ पुत्र से/ एक दुनिया की दूरी पर खड़ा है/ एक सृष्टि का फासला है/ दोनों में | इस तरह हम देखते हैं कि एक कवि के सत्ता विमर्श को समझने की कुंजी हो सकती हैं पिता पर लिखी उसकी कविताएँ | मनोज की पंक्तियाँ फिर एक बार दोहराऊँ तो कह देना चाहिए कि -एक शाप मिला है/ सारे विश्व के पिताओं को/ कि वे सदैव पिता ही रहेंगे/ दोस्त बनने के सभी ढकोसलों के बावजूद/ वे पुत्र/ जो पुत्र रहे पिता की नजर में/ पिता बनते ही/ दृष्टि ले लेते हैं पिता की/ उन सभी अवसरों पर/ तानाशाह बने रहते हैं/ जिन अवसरों पर/ अपने पिता से अप्रसन्न थे | यहाँ मनोज के उस इशारे को समझने की जरूरत है जहाँ वे पिता की तुलना एक तानाशाह से करते हैं |



अक्षर घाट -65


पिछले दिनों अशोक वाजपेयी ने इस साल का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार किसी युवा कवि को न देने का निर्णय लिया | युवाओं में अशोक वाजपेयी के इस निर्णय को लेकर अजीबोगरीब प्रतिक्रियाएँ आती रहीं | कोई पूछ रहा है कि क्या धरती वीरों से खाली हो गई है तो कोई सुझा रहा है कि फलाँ-फलाँ को ही पढ़ लिया होता | सच कहूँ तो मुझे अशोक वाजपेयी के फैसले ने ज़रा भी हैरान नहीं किया | मैं तो खुद कई मर्तबा लिखता रहा हूँ कि ऐसा भी कोई निर्णय आए कि किसी को योग्य नहीं पाया गया | ऐसे फैसलों के पीछे मंशा चाहे जो भी हो उसका मैं स्वागत करता हूँ | बल्कि मुझे कहीं अधिक खुशी होगी यदि अगले कुछ वर्षों के लिए कविता कहानी आदि के लिए दिए जाने वाले सारे पुरस्कार और सम्मान मुल्तवी कर दिए जाएँ | आखिर कौन सा तीर मार रहे हैं लोग कविता कहानी लिखकर कि उन्हें पुरस्कृत और सम्मानित होने की आवश्यकता महसूस होती है | मैं बड़ी उम्मीद से युवाओं की तरफ देख रहा था कि शायद उनमें से कोई आगे बढ़ कर कहे कि –यह लो अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो | लेकिन एक निष्प्रयोजन सी वस्तु को अंततः बेहद प्रयोजनीय सिद्ध किया जाता रहा | ख़ैर आज मुद्दा यह नहीं है बल्कि इसी बहाने मुझे ऐसे कवियों की याद हो आई जो हमेशा ही इस चूहे दौड़ से बाहर रहे |
नीलाम्बुज सिंह के साथ बातचीत में कई बार रमाशंकर यादव विद्रोही की चर्चा होती रही है | नीलाम्बुज हिन्दी साहित्य के युवा शोधार्थी और काव्य प्रेमी हैं | ग़ज़लें लिखते हैं | अपने ब्लॉग पर उन्होने विद्रोही जी की कविताएँ लगा रखी हैं जिनको देखने के बाद मेरी उत्सुकता इस कवि में बढ़ी | अभी विद्रोही का पहला और एकमात्र काव्य संग्रह पढ़कर खत्म किया है | सन 2011 में इसे जनसंस्कृति मंच के सांस्कृतिक संकुल ने व्यक्तिगत प्रयासों से प्रकाशित कराया है | कवि की उम्र इस वक़्त सत्तावन अट्ठावन साल के करीब होगी | और पुरस्कार सम्मान की बात तो जाने ही दीजिए मुझे लगता है विद्रोही को जानने वाले भी आज कम ही होंगे | प्रणय कृष्ण ने अपनी लंबी भूमिका में एक किंवदंती के हवाले से बताया है कि विद्रोही दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्व विध्यालय के छात्र रहे हैं और उन्हें सेमिनार पेपर में लिखने की जगह बोलने की मांग के कारण मूल्यांकित नहीं किया गया | वे आज भी  उसी विश्व विद्यालय में देखे जा सकते हैं | उम्र के चौथेपन में एक कवि जो कविता लिखता नहीं बल्कि बोलता है वह इस कदर उपेक्षित है कि किसी लेख में दो शब्द उसपर देखने पढ़ने को नहीं मिलता | ऐसे में पुरस्कार के लिए युवाओं का अरण्य रोदन विचलित करता है | मैंने जानने का प्रयास किया कि विद्रोही नाम का यह कवि आखिर है क्या चीज़ | आप यह जानकर हैरान होंगे कि इस कवि के पास कई आला दर्जे की कविताएँ हैं | हालांकि समग्रता में विद्रोही मुझे अत्यधिक वाचाल कवि लगते हैं |
विद्रोही की एक छोटी सी कविता को हू-ब-हू उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ | विद्रोही लिखते हैं –
मैं भी मरुंगा /और भारत भाग्य विधाता भी मरेगा /मारना तो जन-गण-मन अधिनायक को भी पड़ेगा /लेकिन मैं चाहता हूँ / कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरे / फिर भारत भाग्य विधाता मरे / फिर साधु के काका मरें /यानि सारे बड़े बड़े लोग पहले मर लें / फिर मैं मरूँ – आराम से उधर चलकर बसन्त ऋतु में / जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है /या फिर तब जब महुवा चूने लगता है /या फिर तब जब वनबेला फूलती है /नदी किनारे मेरी चीता दहक कर महके /और मित्र सब करें दिल्लगी / कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था / कि सारे बड़े बड़े लोगों को मारकर तब मरा |
रमाशंकर यादव विद्रोही कवि कैसे हैं यह इस कविता से समझा जा सकता है | मुझे लगता है कि यदि इन पंक्तियों के साथ किसी स्थापित कवि का नाम रख दिया जाता तो यह हिन्दी की समकालीन कविता में एक बहु-उद्धृत कविता होती | लेकिन सत्य यह है कि यह विद्रोही की कविता है | सत्य यह भी है कि विद्रोही के अवधी गीतों और ग़ज़लों-नज़्मों ने मुझे प्रभावित नहीं किया | उनकी कविताओं में बड़बोलापन बहुत है और जरूरी भाषिक कसावट की कमी है तथापि कथ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण कविताओं को उनके संग्रह में रेखांकित किया जा सकता है | विद्रोही के इस संग्रह का उनवान है- नयी खेती | इसमें जन-गण-मन शीर्षक लंबी कविता उल्लेखनीय है | विद्रोही वाचिक परम्परा के कवि हैं और कविताएँ कहते हैं | इनका जीवन फकीराना है | लेकिन वे आज की कविता में मिसफिट हैं | आज कविता वाचिक परंपरा की चीज़ नहीं है | उसका छपना आवश्यक है | और छपने के बाद और भी आवश्यक है उसका इस तरह दिखना कि किसी अशोक वाजपेयी या नामवर सिंह की नज़र उसपर पड़े |
यहाँ जरा विषयान्तर होते हुए भी कहने का मन होता है कि इस कवि को जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय कैंपस में सुनते हुए वहाँ से उठकर आए किसी कवि आलोचक को तो दो शब्द लिखना ही चाहिए था विद्रोही पर | यही वह कमजोर कड़ी है जो कविता में आज भी निर्णायक सिद्ध होती है | किसी नए कवि ने दस पाँच कविताएँ अगर लिख ली हैं तो इसके बाद वह अशोक वाजपेयी और नामवर सिंह को गरियाने लगता है | उसे शिकायत होती है कि वरिष्ठ और स्थापित लोग नयों को नहीं पढ़ते | लेकिन मैं पूछना चाहता हूँ ऐसे तमान युवाओं से कि भइया तुमने अपने साथ लिख रहे लोगों को कितना पढ़ा है और उनपर क्या लिखा है | चलो अशोक वाजपेयी या नामवर सिंह ने नहीं पढ़ा कोई बात नहीं | नहीं लिखा तो भी कोई बात नहीं | जो वे कर सकते थे उन्होने किया | जो उनसे नहीं हुआ उसे आप करें | आप यह न भूलें कि एक विद्रोही नाम का कवि है जिसे दिल्ली में और जे एन यु में रहने के बावजूद नहीं पढ़ा गया | वह आज भी आपको पुकारता है – मुझे बचाओ /मैं तुम्हारा कवि हूँ |


अक्षर घाट -64

सोज़े वतन की प्रतियाँ ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर ली थीं जब यह छप कर आया ।प्रशासन की ओर से कड़ी चेतावनी दी गई कि यदि आगे भी लेखन जारी रहा तो जेल में डाल दिया जाएगा । तब प्रेमचंद धनपत राय के नाम से उर्दू में लिखा करते थे । ज़माना नाम के उर्दू रिसाले में वे छपा करते थे । ज़माना के सम्पादक की सलाह पर धनपत राय ने प्रेमचंद नाम से लिखना शुरू किया और क्या खूब लिखते रहे । आज हम देख रहे हैं कि एक धमकी के बाद ही बड़े बड़े लेखक देश छोड़ कर चले जाने की बात करते हैं । प्रेमचंद को इस कोण से भी समझने की जरुरत है ।   
तीन सौ कहानियाँएक दर्जन उपन्यासऔर लगभग तीस हजार पात्रों को रचने वाला एक लेखक । एक सम्मानजनक नौकरी और सुरक्षित जीवन का त्याग करके स्वतन्त्र लेखक का जीवन चुनने वाला लेखक । प्रेमचन्द के परिचय के कोण अनेक हैं । लेखक प्रेमचन्द के उभार का समय भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के उभार का समय भी था । महात्मा गाँधी और बाबा साहेब अम्बेडकर के राजनैतिक सामाजिक आन्दोलनों की उथल पुथल ने प्रेमचंद को गहरे प्रभावित किया । यह एक तथ्य है कि सन उन्नीस सौ पंद्रह में अपनी पहली कहानी के साथ हिंदी में आने वाले इस लेखक का रचनाकाल महज बीस एक साल का रहा । आखिरी कहानी कफ़न वे सन उन्नीस सौ छत्तीस में लिखते हैं । हिंदी कहानी का  एक   दौर प्रेमचंद के नाम दर्ज़ है । कितनी दिलचस्प बात है की उन्हें उपन्यास सम्राट का खिताब बांग्ला के शरतचंद्र से मिलता है । 
प्रेमचंद को इस साल केन्द्रीय विद्यालय काचरापारा काम्पा परिसर के बच्चों ने भी याद किया । नीलाम्बुज सिंह के बुलावे पर इन बच्चों के बीच प्रेमचन्द और हमारा समय विषय पर संगोष्ठी में जाना हुआ । स्कूली बच्चों ने प्रेमचंद की कहानियों पर सुन्दर पोस्टर तैयार किए थे । प्रेमचंद की जीवनी पर आधारित चित्र प्रदर्शनी भी लगाईं । सबसे सुन्दर बात यह रही कि बांग्ला भाषी बच्चों ने भी प्रेमचंद पर तैयारी के साथ अपनी बातें रखीं ।  नमक का दरोगा कहानी का बांग्ला अनुवाद विद्यालय के ही एक बच्चे ने प्रस्तुत किया । 
प्रेमचंद ने साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल कहा था तो इसके निहितार्थ क्या थे यह समझने की जरुरत है । बदलाव की जमीन सामाजिक और सांस्कृतिक मोर्चे पर पहले तैयार होगी । राजनैतिक उद्देश्यों के साथ वह इसके उपरांत ही जुड़ सकती है । हमारा दुर्भाग्य ही है कि बिना किसी सामाजिक सांस्कृतिक मोर्चे के देश का इतना बड़ा लोकतंत्र राजनैतिक कवायद को ही बदलाव का मोर्चा माने बैठा है । प्रेमचंद इस बात को महसूस कर रहे थे कि जॉन की जगह गोविन्द के आ जाने भर से मंजर नहीं बदलेंगे । हमारे समय का एक दारुण दुःख यह भी है कि जॉन और गोविन्द जितना रस्मी बदलाव ही हम देख पाते हैं । आप चाहें तो जॉन और गोविन्द की जगह यू पी ए और एन डी ए भी पढ़ सकते हैं । क्या दिल्ली और क्या लखनऊ और क्या कलकत्ता चित्र सर्वदा एक जैसा ही मिलता है । मुखौटे भर बदल दिए जाते हैं और कहीं कहीं तो मुखौटे बदलने में भी दस बीस या चौंतीस साल का समय बीत जाता है । 
प्रेमचंद का अमर वाक्य आज याद करना चाहिए । क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न करोगे ? ईमान की चिंता प्रेमचंद की किन्द्रीय चिंताओं में से एक है । संकट आज मनुष्य के ईमान को बचा पाने का भी है । महाजन की जगह कारपोरेट ताकतें आ गई हैं । धर्म अपने विद्रूप के साथ समाज की हकीकत बना हुआ है । जाति और वर्ण का भेद गहरा से और गहरा होता चला गया है । आखिर पिछले एक सौ वर्षों में सामाजिक स्तर पर क्या बदला है सिवाय इसके कि छोटी दुकानों से निकल कर आप मॉल जाने लगे हैं या टाइप   राइटर छोड़कर डेस्कटॉप का प्रयोग करने लगे हैं या तार से आगे एस एम् एस और ईमेल भेजने लगे हैं । जब चुनाव आते हैं लोगबाग अगड़े पिछड़े या हिन्दू मुसलमान बन जाते हैं । तो अंततः ये बातें सामाजिक सांस्कृतिक मोर्चे पर हमारी दरिद्रता को ही तो उजागर करती हैं । 
प्रेमचंद के पूरे साहित्य में कुछ बीज शब्द हैं । ईमान और मरजाद ऐसे ही शब्द हैं जिनपर आज खतरा सबसे बढ़कर है । सार्वजनिक जीवन में बड़े बड़े लोगों के करोड़ों के घोटाले देखसुनकर कान पक गए हैं । किसान का जीवन आज भी ऋण के जाल में मछली सा फँसा है । दलित और स्त्री अस्मिता के सवाल आरक्षण की नीतियों के हवाले हैं । लेखक सत्ता के चरणों में लोट रहे हैं । ऐसे में उस प्रेमचंद का जीवन निश्चित ही एक मिसाल है जिसने इन्स्पेक्टर ऑफ़ स्कूल की नौकरी छोड़कर कष्टसाध्य जीवन समय की माँग पर चुना । हममें से कितनों में इस विवेकपूर्ण फैसले का साहस है आज यह प्रश्न भी विचारणीय होना चाहिए ।        
प्रेमचंद अपने जीवन के अंतिम वर्ष में अर्थात सन उन्नीस सौ छत्तीस में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए जिस लखनऊ में प्रगतिशील लेखक की अवधारणा पर सवाल उठा रहे थे उसी लखनऊ में हिंदी का लेखक समाजवाद के नाम पर बाप बेटे की सरकार चालाने वालों और जाति की राजनीति करने वालों के आगे दरबारी की तरह खड़ा पाया जाता है । प्रेमचंद की परंपरा  किसी पार्टी की विचारधारा की बंधक नहीं है । प्रेमचंद गाँधी से प्रभावित होते हुए भी जाति और वर्ण की सामाजिक अवधारणा से टकराते हैं । वे अम्बेडकर से प्रभाव ग्रहण करते हुए भी पूना पैक्ट पर सवाल कर सकते हैं । ये बातें आज भी विचारणीय हैं । 
लोग प्रेमचन्द के जीवन के विभिन्न प्रसंगों की आड़ में उन्हें प्रतिगामी साबित करना चाहें भी तो इसके लिए उन्हें प्रेमचंद के विपुल लेखन के साथ साथ उनके जिए और किए का हिसाब किए बिना आगे बढ़ना मुनासिब नहीं होगा । प्रसंग चाहे पहली पत्नी के त्याग का हो या विवाहेतर सम्बन्ध का हो चाहे बेटी की बीमारी में झाड़ फूँक करने करवाने का हो एक बात पाठकों को नहीं भूलनी चाहिए कि लेखक भी अंततः मनुष्य होता है । एक सच्चा लेखक आजीवन अपनी सीमाओं की पहचान करते हुए अपने अभ्यन्तरीन विचलनों के साथ लड़ते भिड़ते हुए जीता है । प्रेमचंद भी एक मनुष्य थे । अपनी कतिपय सीमाओं के साथ भी वे उतने ही समादृत और स्वीकार्य हैं ।